मैं और दिल-ए-बिस्मिल थे कोई सहारा ना था
मिल गई दुनिया तो फ़िर कोई हमारा ना था
हम सर-ए-साहिल थे उसने हवाले तुफ़ां किया
ज़िन्दगी टकराती रही और कोई किनारा न था
उनके दिल में मैं था, दुनियां थी और मेहमां भी थे
हमको इस दिल में सिवा उसके कोई गंवारा ना था
.तनकीर वाहिदी "हन्नान"
Wednesday, 29 July 2009
Saturday, 25 April 2009
चलो यूं ही सही
रस्म-ओ-रवायात का नाम है ज़िन्दगी तो चलो यूं ही सही
इक सफ़र का नाम है ज़िन्दगी तो चलो यूं ही सही
वाए नाकामि-ए-शौक के दिल ज़र्फ़ हुआ जाता है कहीन
अपना इश्क हुआ नमरूद की बन्दगी तो चलो यूं ही सही
तेरा नाम मेरे नाम के साथ आ जाये तो कयामत है
अब दिल को भी है शर्मिन्दगी तो चलो यूं ही सही
तेरे साथ जीयें तो कैसे तेरे बिन जियें तो क्युं?
तुने ही बक्शी है ये आवारगी तो चलो यूं ही सही
अपनी फ़ितरत में है उसे पाक नज़रों से चुमना
तुम जो कहते हो दिवानगी तो चलो यूं ही सही
* "आतिशमिज़ाज"
इक सफ़र का नाम है ज़िन्दगी तो चलो यूं ही सही
वाए नाकामि-ए-शौक के दिल ज़र्फ़ हुआ जाता है कहीन
अपना इश्क हुआ नमरूद की बन्दगी तो चलो यूं ही सही
तेरा नाम मेरे नाम के साथ आ जाये तो कयामत है
अब दिल को भी है शर्मिन्दगी तो चलो यूं ही सही
तेरे साथ जीयें तो कैसे तेरे बिन जियें तो क्युं?
तुने ही बक्शी है ये आवारगी तो चलो यूं ही सही
अपनी फ़ितरत में है उसे पाक नज़रों से चुमना
तुम जो कहते हो दिवानगी तो चलो यूं ही सही
* "आतिशमिज़ाज"
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